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Reading: गढ़वाल का विद्रोही गायक : नरेंद्र सिंह नेगी@ सभार: अविनाश चंद्र प्रवक्ता ( हिंदी )
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Black and White Live > Blog > राज्य > उत्तरप्रदेश > गढ़वाल का विद्रोही गायक : नरेंद्र सिंह नेगी@ सभार: अविनाश चंद्र प्रवक्ता ( हिंदी )
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गढ़वाल का विद्रोही गायक : नरेंद्र सिंह नेगी@ सभार: अविनाश चंद्र प्रवक्ता ( हिंदी )

Web Editor
Last updated: 2022/12/30 at 9:02 AM
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Black and white@ Desk 

गढ़वाल का विद्रोही गायक : नरेंद्र सिंह नेगी

4 दिसंबर 2006

मैं अपनी नौकरी ज्वाइन करने के लिए राजकीय इंटरमीडिएट काॅलेज भरोलीखाल जा रहा था । कोटद्वार से सुबह 4 बजे वाली बस पकड़ी । यह मेरी प्रथम पर्वतीय क्षेत्र की यात्रा थी । इससे पहले मैंने पहाड़ देख भी नहीं रखा था । कहाॅं बिहार की सीमा से लगता उत्तर प्रदेश का बलिया ज़िला और कहाॅं उत्तराखंड का पौड़ी गढ़वाल । यहाॅं तक आते आते इतिहास, भूगोल, भाषा , संस्कृति सब कुछ परिवर्तित हो जाती है । जब एक तरफ पहाड़ और एक तरफ खाई नज़र आती थी तो कलेजा मुंह को आ जाता था ।
तभी बस वाले ने एक गीत लगा दिया । गीत गढ़वाली में था । गीत इस प्रकार से था

तेरी खुद तेरो ख्याल
तेरो समळोण्या रुमाल
सेरी जिंदगी भरो क्यमायु
मेरु इच माल ताल
मेरु इच माल ताल

गीत का अर्थ समझ में नहीं आ रहा था । मैं‌ भोजपुरी भाषी क्षेत्र का रहनेवाला हूॅं और यह गीत गढ़वाली में था लेकिन गीत में अजीब़ ही कशिश थी तथा इसे सुनकर मन को अपूर्व शांति मिल रही थी ।
ऐसा लग रहा था कि जैसे यह साक्षात् हिमालय की आवाज़ हो । यह गीत यात्रा की थकान , भय सबको दूर भगाते हुए मन में एक अजीब-सी शांति और प्रसन्नता का संचार कर रहा था । ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इस गीत के माध्यम से हिमालय मेरा स्वागत करते हुए कह रहा हो कि डरने की कोई बात नहीं है , स्वागत है ऐ परदेशी तेरा ” बीरु भड़ू के देश , बावन गढ़ू के देश में ।”
बाद में पता करने पर पता चला कि इस गीत के गायक का नाम है ” नरेंद्र सिंह नेगी । ” इसके बाद तो मैं नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों का फैन हो गया । उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में नौकरी करते हुए मुझे श्री नेगी जी के गाए अनेकों गढ़वाली गीत सुनने का अवसर प्राप्त हुआ । सबसे ज्यादा नेगी जी के गीत मैंने सर्पिलाकार पर्वतीय मार्गों पर टैक्सियों में यात्रा करते समय सुना । अगर आपने गढ़वाल में सर्पिलाकार पर्वतीय मार्गों पर चलते हुए वाहनों में यदि गढ़वाली गीत नहीं सुने तो समझिए आप एक बहुत बड़े आनंद से वंचित रह गए ।
उत्तराखंड के दो प्रमुख हिस्से हैं – गढ़वाल और कुमाऊं । प्राचीन काल में इनको केदारखंड और मानसखंड के नाम से जाना जाता था । केदारखंड ही बाद में चलकर गढ़वाल कहलाया । इसको गढ़वाल इसलिए कहा जाता है क्योंकि कभी इस क्षेत्र में बावन गढ़ स्थित थे । इन गढ़ों के वीरों यथा, वीरबाला तीलू रौतेली , कफ्फू चौहान , महाराजा कनकपाल , सुमाड़ी के पंथ्या दादा आदि की कहानियाॅं आज़ भी गढ़वाल के पहाड़ों, घाटियों में गूॅंजती रहती हैं । नेगी जी ने अपने सुप्रसिद्ध गीत ” बीरु भड़ू को देश, बावन गढ़ू को देश” में इन बावन गढ़ों की कहानियों को जैसे माला के एक सूत्र में पिरो दिया है ।

” बीरु भड़ू को देस
बावन गढ़ू को देस
जै जै बदरी केदार
गढ़भूमि गढ़नरेस। ”

अगर गढ़वाल के गौरवपूर्ण इतिहास से आप परिचित होना चाहते हैं तो इस गीत को अवश्य सुनें । मैंने स्वयं इस गीत को सैकड़ों बार सुना है । मन‌ ही नहीं भरता ।
गढ़वाल का इतिहास, भूगोल, संस्कृति, हर्ष , विषाद , सुख दुख , श्रृंगार , हास्य , ऋतुचक्र सभी कुछ नेगी जी के गीतों में उपलब्ध है । नेगी जी के गीत गढ़वाल की आत्मा हैं ।
संयोग श्रृंगार :

” माछी पाणीं सी जिउ तेरु मेरु हो
बिना तेरा नी जिंयेदु
न रयेंदु त्वे बिना । ”

” भलु लाग्युदु भनुली तेरु
मठु मठु हिटणुं
भलु लाग्युदु ।

वियोग श्रृंगार :

तेरी पिड़ा मा द्वी आंसू मेरा भी
तौरी जाला पिड़ा ना लुकैयी
ज्यू हल्कू ह्वे जालु तेरु भी
द्वी आखर चिट्ठी मा लेखी देई

हास्य :
दारोल्या छौं न भंगुल्या
भंगलाड़ा ढोल्यूं छौं
कई मा ना बोल्यां भैज्युं
जनानी को मार्यौ छौं
नीतिपरक गीत

ना दौड़ ना दौड़
तैं उन्दरी का बाटा
उन्दार्यों का बाटा

ना बैठ ना बैठ
ना बैठ चरखी मा
सावन के महीने में पहाड़ों में भयंकर बरसात होती है । पहाड़ खिसकने से रास्ते बंद हो जाते हैं , नदियाॅं बढ़ जाती हैं , नाले उफान पर आ जाते हैं । इसका वर्णन इस गीत में है :

सौंणा का मैना
ब्वे कणुं क्वे रैंणा
कुयेंड़ी लौकाली
अंधेरी रात बरखा की झमणाट
खुद तेरी लागाली
इसी तरह से वर्षा ऋतु का एक वर्णन देखिए :

गराररा ऐगे रे बर्खा झुकी ऐगे ।
सराररा डांड्यूमां कुएणी छैगे ।।

गढ़वाल में बसंत ऋतु सुहावनी होती है । इस ऋतु में पहाड़ , घाटियाॅं बुराॅंस , फ्यूंली , पय्यां के सुंदर फूलों से भर जाते हैं । मौसम सुहावना हो जाता है । गढ़वाल में बसंत ऋतु का सुंदर चित्रण इस गीत में हुआ है :

मेरी डांडी काठ्यूं का मुलुक जैलू
बसंत ऋतु मां जैई
या
रुणुक झुणुक रितु बसन्ति गीत लगांद ऐगे
बसन्त ऐगे हपार डांडा सारयूंमा ।
ठुमुक ठुमुक गुन्दक्यली खुट्यून हिटीकि ऐगे
बसन्त ऐगे लिपि पोतीं डिंड्याळयूं मा ।।

एक गढ़वाली अपने गांव की विशेषता बताते हुए आपको अपने गांव में आमंत्रित करता है । इससे सुंदर कहीं गढ़वाली गाॅंव का वर्णन नहीं मिलेगा ।

ना उकाल ना उदांर
सीधू सैंणू धार धार
गौं का बाटू
मेरा गौं का बाटू
ऐ जाणूं कभी मठु माठू
मठु माठू
इसी तरह से पर्यावरण को बचाने के लिए पेड़ों को न काटने का आग्रह करता हुआ यह गीत देखिए :

डाळयूं न काटा दिदौं , डाळयूं न काटा
डाळयूं न काटा भुल्यूं , डाळयूं न काटा
डाळि कटेली तो माटि बगाली
न कूड़ि न पुंगड़ी न डोखरी बचाली
घास लखड़ा त खेती ही राली
भोल तेरि आस औलाद क्य खाली

नेगी जी को विद्रोही कहने का आशय यह है कि नेगी जी कभी सत्ता से डरे नहीं । जहां तक हो सका उन्होंने सत्ता पर पूरा प्रहार किया । यही कवि , साहित्यकार तथा कलाकार की विशेषता है । जिसके भीतर सत्ता की आलोचना की हिम्मत न हो उसे साहित्य , कविता और कला का रास्ता छोड़ देना चाहिए ।

प्रख्यात गीत ” नौछमी नारैणा ” जो उत्तराखंड के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को लक्ष्य करके गाया गया था , इस गीत को गाने की हिम्मत नरेंद्र सिंह नेगी जैसा शेर ही कर सकता था जो किसी भी प्रकार के सम्मान के लालच तथा दंड के भय से दूर था । इस गीत के विरोध में नेगी जी के पुतले फूंके गए तथा कैसेटों की प्रतियाॅं जलायी गईं लेकिन नेगी जी ने अविचल रहते हुए इस घटना पर एक दूसरा व्यंग्यात्मक गीत बना डाला –

“नेगी दा !
यनां गीत ना लगा , नौछमी नारैण ना गा
हमको बड़ी दिक्कत होंद ”
26 जनवरी 1950 को हम लोकतांत्रिक देश बने लेकिन कालांतर में वह लोकतंत्र विडंबनात्मक लोकतंत्र में परिवर्तित हो गया जिसके बारे में दुष्यंत कुमार लिखते हैं ः

कहां तो तय था चिराॅंगा हरेक घर के लिए ।
कहाॅं चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए ।।

इस विडंबनात्मक लोकतंत्र के दर्शन चुनावों में मिलता है जब चुनाव जीतने के लिए रुपए और दारू का जमकर उपयोग किया जाता है । किस तरह से चुनाव में दारू की गंगा बहती है इसका चित्रण द्रष्टव्य है :

“हाथन हुसुकि पिलाई , फूलन पिलायो रम
छोटा दल निरदल दिदौंन कच्ची मा टरकाया हम
ऐसे चुनौं में मजा ही मजा
दारू पी रुपया भी ठम्म ठम्म ”

इस बिडंबनात्मक लोकतंत्र में घूसखोरी , कमीशनखोरी आम बात है ।‌ इसका जाल उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक फैला हुआ है । नेगी जी ने इसको भी निशाना बनाया है :

“कमीशन की मीट भात रिसवत को रैळो
रिसवत को रैळो रे
बस कर भंड ना सपोड़
अब कथगा खैल्यो
कथगा जी खैल्यो रे ”

इसी तरह ” मार तानी आखिरी दम ” गाने में भी नेगी जी आज़ की विद्रूप राजनीति को अपना निशाना बनाया है ।
घास काटने वाली औरतों को वन रक्षक वन में जाने से रोकता है

ना जा ना जा तौं भेळु पखाण
जिदेरी घसेरी बोल्यूं माण
औण नि देन्दी तू सरकारी बोण
गौर भैस्यूं मिन क्या खलाण

गीत का सबसे कारुणिक पक्ष वह है जिसमें सभी तरह के तर्क से घसियारी औरतों को रोकने में असफल पतरोळ ( वन रक्षक ) अंत में अपने नौकरी और बाल बच्चों की दुहाई देकर उनको वन में घास न काटने के लिए जाने की विनती करता है :

पाड़ै बेटी ब्वारयूं कू बण ही च सारु
जणदू छौं मी भी पर क्याजि कारु
दया जु आली
साबल सूण्याली
त नौकरी जाली
मेरी छुट्टी ह्वे जाण
बाल बच्चों मिन क्या खलाण

वाह रे हमारे देश की व्यवस्था ।

गंगा का प्रदूषण आज़ की सबसे बड़ी समस्या है । नेगी जी ने इसे भी अपनी आवाज़ का विषय बनाया है :

गन्दुलु कैरियाली त्यारु छाळु पाणी गंगा जी
मां का दूदै लाज भी नी राखि जाणि गंगा जी
गंगा मातामी माई हर हर गंगे
गंगा मातामी माई हर हर गंगे

इसी तरह से ऐतिहासिक टिहरी शहर का टिहरी बाॅंध के पानी में डूब जाना भी एक ऐतिहासिक घटना थी । नेगी जी इस पीड़ा को इस गीत में व्यक्त किया है :

अबारी दां तु लम्बी छुट्टी लेकी ऐई , ऐगे बगत आखीर ,
टीरि डुबुण लैग्यूं च बेटा , डाम का खातीर

जहां आज़ एकता कपूर और कंगना रनौत जैसे लोगों सहित तमाम ऐरे गैरे , नत्थू खैरे को पद्म पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है सत्ता को ललकारने के कारण नेगी जी आज़ तक पद्म पुरस्कारों के योग्य नहीं समझा गया । पुरस्कारों की आवश्यकता चमचों को होती है । एक सच्चा कवि , साहित्यकार , कलाकार बिना किसी लालच और भय के अपना कार्य किए जाता है ।
नेगी जी वास्तव में गढ़वाल के शेर हैं । कुछ दिन पहले उनको हृदयाघात हुआ था । उनकी सलामती के लिए दुआ मांगने के लिए हजारों हाथ ऊपर की ओर उठे जिनमें से दो हाथ मेरे भी थे । परमात्मा की कृपा रही कि नेगी जी स्वस्थ होकर हमारे बीच लौट आए । उनकी आवाज़ हमेशा गूॅंजती रहे यही हमारी कामना है ।

अविनाश चंद्र
प्रवक्ता ( हिंदी )
अटल उत्कृष्ट राजकीय इंटरमीडिएट काॅलेज बिलखेत पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड ।

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